लेखक:- vikram raj thakur 01.2

Ghazal love shayari



फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


टैग्ज़: इश्क़ और 6 अन्य
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें







अहमद फ़राज़

 
टैग्ज़: जुदाई और 1 अन्य
इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया

वर्ना हम भी आदमी थे काम के







मिर्ज़ा ग़ालिब

 
टैग्ज़: इश्क़ और 2 अन्य
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं

किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं



फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

 
टैग: याद
इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के

अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के



फ़रहत एहसास


टैग्ज़: इंतिज़ार और 1 अन्य
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ



अहमद फ़राज़

 
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एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें

और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं



फ़िराक़ गोरखपुरी


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किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम

तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ



अहमद फ़राज़

 
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मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले







मिर्ज़ा ग़ालिब

 
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अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ

अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ



अनवर शऊर


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इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता



अकबर इलाहाबादी


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कोई समझे तो एक बात कहूँ

इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं







फ़िराक़ गोरखपुरी


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आते आते मिरा नाम सा रह गया

उस के होंटों पे कुछ काँपता रह गया



वसीम बरेलवी

 
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आज देखा है तुझ को देर के बअ'द

आज का दिन गुज़र न जाए कहीं



नासिर काज़मी

 
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फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था

सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था



अदीम हाशमी

 
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दिल धड़कने का सबब याद आया

वो तिरी याद थी अब याद आया



नासिर काज़मी

 
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इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'

कि लगाए न लगे और बुझाए न बने







मिर्ज़ा ग़ालिब

 
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तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ

मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ



अल्लामा इक़बाल

 
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इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है

सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है



जिगर मुरादाबादी

 
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आख़री हिचकी तिरे ज़ानूँ पे आए

मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ



क़तील शिफ़ाई

 
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ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मोहब्बत के बावजूद

महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी कभी



नासिर काज़मी

 
टैग्ज़: इश्क़ और 1 अन्य
अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उमीदें

ये आख़िरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ







अहमद फ़राज़

 
टैग्ज़: इश्क़ और 2 अन्य
उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो

धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है



राहत इंदौरी

 
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आरज़ू है कि तू यहाँ आए

और फिर उम्र भर न जाए कहीं



नासिर काज़मी

 
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करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम

मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता



ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

 
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होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है

इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है



निदा फ़ाज़ली


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आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें

हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं



साहिर लुधियानवी

 
टैग्ज़: इश्क़ और 2 अन्य
तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही

तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ



साहिर लुधियानवी


टैग्ज़: इश्क़ और 4 अन्य
झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं

दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं



कैफ़ी आज़मी

 
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चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है



हसरत मोहानी

 
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भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम

क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए



ख़ुमार बाराबंकवी

 
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ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ

मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया



साहिर लुधियानवी

 
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ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है



जिगर मुरादाबादी

 
टैग्ज़: इश्क़ और 2 अन्य
इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया

दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया







मिर्ज़ा ग़ालिब

 
टैग्ज़: इश्क़ और 2 अन्य
याद रखना ही मोहब्बत में नहीं है सब कुछ

भूल जाना भी बड़ी बात हुआ करती है



जमाल एहसानी

 
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वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा

मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा



परवीन शाकिर

 
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जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ

जाने क्यूँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं







क़तील शिफ़ाई

 
टैग्ज़: इश्क़ और 3 अन्य
चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी

वगरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते







क़तील शिफ़ाई

 
टैग्ज़: इश्क़ और 3 अन्य
दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं

कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं



जिगर मुरादाबादी

 
टैग्ज़: इश्क़ और 3 अन्य
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब

दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक







मिर्ज़ा ग़ालिब

 
टैग्ज़: इश्क़ और 1 अन्य
लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से

तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से



जाँ निसार अख़्तर

 
टैग्ज़: आँख और 3 अन्य
आदमी जान के खाता है मोहब्बत में फ़रेब

ख़ुद-फ़रेबी ही मोहब्बत का सिला हो जैसे



इक़बाल अज़ीम


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चंद कलियाँ नशात की चुन कर मुद्दतों महव-ए-यास रहता हूँ

तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ



साहिर लुधियानवी


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अहल-ए-हवस तो ख़ैर हवस में हुए ज़लील

वो भी हुए ख़राब, मोहब्बत जिन्हों ने की



अहमद मुश्ताक़

 
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इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए

और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए



विपुल कुमार

 
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बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल

कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का



मिर्ज़ा ग़ालिब

 
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तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा

मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है



अमीर मीनाई


टैग्ज़: इश्क़ और 2 अन्य
दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं

लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं